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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th Jan 2025

    उतनी ही हर नदी है!

    छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से,उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है| निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2025

    लगता है हर लिबास!

    इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई,लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है| निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2025

    चर्ख़ा है जिस के पास !

    माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही,चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है| निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2025

    वही बात ख़ास है!

    मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो,क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है| निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2025

    दुख नदी-भर!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश निगम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। निगम जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरीश निगम जी का यह नवगीत – सुख अंजुरि-भरदुख नदी-भरजी रहेदिन-रात सीकर! ढही भीतीउड़ी छानीमेह सूखेआँख पानी फड़फड़ातेमोर-तीतर! हैं हवा केहोंठ दरकेफटे रिश्तेगाँव-घर…

  • 29th Jan 2025

    यूँ लग रहा है जैसे!

    यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है,वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है| निदा फ़ाज़ली

  • 29th Jan 2025

    बाक़ी जो कुछ है!

    इश्क़ की उम्र कम ही होती है, बाक़ी जो कुछ है दोस्ताना है| निदा फ़ाज़ली

  • 29th Jan 2025

    उस का आस्ताना है!

    कैसी मस्जिद कहाँ का बुत-ख़ाना,हर जगह उस का आस्ताना है| निदा फ़ाज़ली

  • 29th Jan 2025

    आब-ओ-दाना ही!

    देस परदेस क्या परिंदों का,आब-ओ-दाना ही आशियाना है| निदा फ़ाज़ली

  • 29th Jan 2025

    कोई मंज़र सदा!

    कोई मंज़र सदा नहीं रहता,हर तअ’ल्लुक़ मुसाफ़िराना है| निदा फ़ाज़ली

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