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ये काम किस का था!
वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किस ने किया है ये काम किस का था| दाग़ देहलवी
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वो नाम किस का था!
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था,न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था| दाग़ देहलवी
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फटा-पुराना ख़्वाब है!
फटा-पुराना ख़्वाब है मेरा फिर भी ‘ताबिश’,इस में अपना-आप छुपाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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रात की पेशानी का!
ये महताब ये रात की पेशानी का घाव,ऐसा ज़ख़्म तो दिल पर खाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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इश्क़ में कितना नाम!
मुझ गुमनाम से पूछते हैं फ़रहाद ओ मजनूँ,इश्क़ में कितना नाम कमाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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आज तुम से बिछड़ रहा हूँ!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और शायर स्वर्गीय सुदर्शन फ़ाकिर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। फ़ाकिर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय सुदर्शन फ़ाकिर जी की यह ग़ज़ल – आज तुम से बिछड़ रहा हूँआज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुम सेतुम मेरा…
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दिल पर पानी पीने!
दिल पर पानी पीने आती हैं उम्मीदें, इस चश्मे में ज़हर मिलाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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हर इक दुआ के!
हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है,तमाम ग़ुंचे तो ‘अमजद’ खिला नहीं करते। अमजद इस्लाम अमजद