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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Jan 2025

    ये काम किस का था!

    वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किस ने किया है ये काम किस का था| दाग़ देहलवी

  • 25th Jan 2025

    वो नाम किस का था!

    तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था,न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था| दाग़ देहलवी

  • 25th Jan 2025

    फटा-पुराना ख़्वाब है!

    फटा-पुराना ख़्वाब है मेरा फिर भी ‘ताबिश’,इस में अपना-आप छुपाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 25th Jan 2025

    रात की पेशानी का!

    ये महताब ये रात की पेशानी का घाव,ऐसा ज़ख़्म तो दिल पर खाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 25th Jan 2025

    इश्क़ में कितना नाम!

    मुझ गुमनाम से पूछते हैं फ़रहाद ओ मजनूँ,इश्क़ में कितना नाम कमाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 25th Jan 2025

    आज तुम से बिछड़ रहा हूँ!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और शायर स्वर्गीय सुदर्शन फ़ाकिर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। फ़ाकिर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय सुदर्शन फ़ाकिर जी की यह ग़ज़ल – आज तुम से बिछड़ रहा हूँआज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुम सेतुम मेरा…

  • 25th Jan 2025

    दिल पर पानी पीने!

    दिल पर पानी पीने आती हैं उम्मीदें, इस चश्मे में ज़हर मिलाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 24th Jan 2025

    नाकाम मोहब्बत!

    एक मोहब्बत और वो भी नाकाम मोहब्बत,लेकिन इस से काम चलाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 24th Jan 2025

    अब भी जलता शहर!

    पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है,अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 24th Jan 2025

    हर इक दुआ के!

    हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है,तमाम ग़ुंचे तो ‘अमजद’ खिला नहीं करते। अमजद इस्लाम अमजद

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