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मैं ख़ुद उड़ा दूँगा!
हवा का हाथ बटाऊँगा हर तबाही में, हरे शजर से परिंदे मैं ख़ुद उड़ा दूँगा| मोहसिन नक़वी
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सारे दिए बुझा दूँगा!
ये तीरगी मिरे घर का ही क्यूँ मुक़द्दर हो, मैं तेरे शहर के सारे दिए बुझा दूँगा| मोहसिन नक़वी
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मरूँगा ख़ुद भी!
मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा, मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा| मोहसिन नक़वी
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पल भर न हुआ जीवन प्यारा!
आज मैं हिन्दी की श्रेष्ठ कवियित्री स्वर्गीया सुमित्रा कुमारी सिन्हा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीया सुमित्रा कुमारी सिन्हा जी की यह कविता- पल भर न हुआ जीवन प्यारा! पूजा के मंदिर में झाँका,अर्चन की चाहों को आँका,जग ने अपराधिनि ठहराया, आजीवन खुल…
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नदी की मस्त अदाएँ!
हसीन चम्पई पैरों को जब से देखा है, नदी की मस्त अदाएँ बुला रही हैं तुम्हें| साहिर लुधियानवी
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झुकी झुकी सी घटाएँ!
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू की भीक लेने को, झुकी झुकी सी घटाएँ बुला रही हैं तुम्हें| साहिर लुधियानवी
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हवाएँ बुला रही हैं!
तरस रहे हैं जवाँ फूल होंट छूने को, मचल मचल के हवाएँ बुला रही हैं तुम्हें| साहिर लुधियानवी
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ख़मोशियों की सदाएँ!
ये वादियाँ ये फ़ज़ाएँ बुला रही हैं तुम्हें, ख़मोशियों की सदाएँ बुला रही हैं तुम्हें| साहिर लुधियानवी