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चढ़ते सैलाब में!
चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया, लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं| गुलज़ार
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लोग हैं अख़बार से हैं!
नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब* में हूँ, और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं| *भंवर गुलज़ार
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शाम से तेज़ हवा!
पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं, शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं| गुलज़ार
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प्रथम रश्मि!
आज एक बार फिर मैं छायावाद के प्रमुख स्तंभ और प्रकृति के सुकुमार कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता- प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!तूने कैसे पहचाना?कहाँ, कहाँ…
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इस आइने को कोई!
बहुत दिनों से मिरा दिल उदास है ‘मोहसिन’, इस आइने को कोई अक्स अब नया दूँगा| मोहसिन नक़वी
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मैं तेरे ख़त तिरी!
बढ़ा रही हैं मिरे दुख निशानियाँ तेरी, मैं तेरे ख़त तिरी तस्वीर तक जला दूँगा| मोहसिन नक़वी
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ज़मीं हूँ मैं भी मगर!
तू आसमान की सूरत है गिर पड़ेगा कभी, ज़मीं हूँ मैं भी मगर तुझ को आसरा दूँगा| मोहसिन नक़वी
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इसी ख़याल में गुज़री!
इसी ख़याल में गुज़री है शाम-ए-दर्द अक्सर, कि दर्द हद से बढ़ेगा तो मुस्कुरा दूँगा| मोहसिन नक़वी