-
अक्स-ए-बदन भी है!
माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है, पर इस में कुछ करिश्मा-ए-अक्स-ए-बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
-
फ़ख़्र करते थे कभी!
अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें, फ़ख़्र करते थे कभी जिन की मुलाक़ातों पे हम| जाँ निसार अख़्तर
-
हँस दिया करते थे!
ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें, हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम| जाँ निसार अख़्तर
-
मुफ़्त का इल्ज़ाम!
कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं, मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते हैं बरसातों पे हम| जाँ निसार अख़्तर
-
चिंता है फकीरों की!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि, समीक्षक तथा बाबा नागार्जुन और फणीश्वर नाथ रेणु जी के संबंध में उल्लेखनीय पुस्तकें लिखने वाले स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यायावर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं तथा वे फेसबुक पर मेरे मित्र भी…