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उसने आवाज़ें तो दीं!
फूल में रंगत भी थी ख़ुशबू भी थी और हुस्न भी, उस ने आवाज़ें तो दीं लेकिन कहाँ मैं सुन सका| कृष्ण बिहारी नूर
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है किताब-ए-ज़िंदगी!
अव्वल-ओ-आख़िर के कुछ औराक़ मिलते ही नहीं, है किताब-ए-ज़िंदगी बे-इब्तिदा बे-इंतिहा| कृष्ण बिहारी नूर
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ख़त्म होता ही नहीं!
इक तरफ़ क़ानून है और इक तरफ़ इंसान है, ख़त्म होता ही नहीं जुर्म-ओ-सज़ा का सिलसिला| कृष्ण बिहारी नूर
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भागा किया दौड़ा!
उस की धुन में हर तरफ़ भागा किया दौड़ा किया, एक बूँद अमृत की ख़ातिर मैं समुंदर पी गया| कृष्ण बिहारी नूर
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अँगूठे का निशान!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आपकी रचनाएं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ में भी सम्मिलित की गई थीं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की यह कविता –…
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जीवन से ले गया वो!
अब क्या है अर्थ-हीन सी पुस्तक है ज़िंदगी, जीवन से ले गया वो कई दिन निकाल के| कृष्ण बिहारी नूर
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हैं उस के पास आइने!
मौसम हैं दो ही इश्क़ के सूरत कोई भी हो, हैं उस के पास आइने हिज्र-ओ-विसाल के| कृष्ण बिहारी नूर
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गाढ़ी कमाई है ज़िंदगी!
पिछले जन्म की गाढ़ी कमाई है ज़िंदगी, सौदा जो करना करना बहुत देख-भाल के| कृष्ण बिहारी नूर