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मीत, तुम जगते रहना!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहना तुम मूंदोगे…
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उम्रें गुज़र जाती हैं नूर!
हाँ मगर तस्दीक़ में उम्रें गुज़र जाती हैं ‘नूर’, कुछ न कुछ रहता है सब को अपनी मंज़िल का पता| कृष्ण बिहारी नूर
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प्यार सच्चा है तो फिर!
ज़िंदाबाद ऐ दिल मिरे मैं भी हूँ तुझ से मुत्तफ़िक़, प्यार सच्चा है तो फिर कैसी वफ़ा कैसी जफ़ा| कृष्ण बिहारी नूर
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एक दिन मैं ख़ुद ही!
जब न मुझ से बन सकी उस तक रसाई की सबील, एक दिन मैं ख़ुद ही अपने रास्ते से हट गया| कृष्ण बिहारी नूर
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आइना-दर-आइना!
हुस्न-ओ-उलफ़त दोनों हैं अब एक सत्ह पर मगर, आइना-दर-आइना बस आइना-दर-आइना| कृष्ण बिहारी नूर
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उजाले की दीवार!
जैसे अन-देखे उजाले की कोई दीवार हो, बंद हो जाता है कुछ दूरी पे हर इक रास्ता| कृष्ण बिहारी नूर
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मैं छोटा हूँ झुका दूँगा!
मैं तो छोटा हूँ झुका दूँगा कभी भी अपना सर, सब बड़े ये तय तो कर लें कौन है सब से बड़ा| कृष्ण बिहारी नूर
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चौंको मत मेरे दोस्त!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की यह कविता – चौंको मत मेरे दोस्तअब जमीन किसी का इंतजार नहीं करती।पांच साल…
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उसने आवाज़ें तो दीं!
फूल में रंगत भी थी ख़ुशबू भी थी और हुस्न भी, उस ने आवाज़ें तो दीं लेकिन कहाँ मैं सुन सका| कृष्ण बिहारी नूर