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पर आँखें नहीं भरीं!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी का यह गीत – कितनी बार तुम्हें देखापर आँखें नहीं भरीं। सीमित उर में चिर-असीमसौंदर्य समा न…
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आग पानी में भी!
मुझ को रोता हुआ देखें तो झुलस जाएँ रक़ीब,आग पानी में भी ऐ सोज़-ए-जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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मेरी नज़र पैदा कर!
आईना देखना इस हुस्न पे आसान नहीं,पेश-तर आँख मिरी मेरी नज़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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और जिगर पैदा कर!
काम लेने हैं मोहब्बत में बहुत से या रब,और दिल दे हमें इक और जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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असर पैदा कर!
दूद-ए-दिल इश्क़ में इतना तो असर पैदा कर,सर कटे शम्अ की मानिंद तो सर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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दे मोहब्बत तो!
दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर,जो इधर दिल में है या रब वो उधर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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खुशबू की आवाज़!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत – मुक्ति बीज बोए मीठे अनुबंध नेऐसी वर्षा की गुलाब की गंध ने मौसम बदला थमी…