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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Feb 2025

    तू कोई झील है!

    रूह की प्यास बुझा दी है तिरी क़ुर्बत ने,तू कोई झील है झरना है घटा है क्या है| नक़्श लायलपुरी

  • 21st Feb 2025

    तेरी आँखों में कई!

    तेरी आँखों में कई रंग झलकते देखे,सादगी है कि झिझक है कि हया है क्या है| नक़्श लायलपुरी

  • 21st Feb 2025

    कोई झंकार है नग़्मा!

    कोई झंकार है नग़्मा है सदा है क्या है,तू किरन है के कली है के सबा है क्या है| नक़्श लायलपुरी

  • 21st Feb 2025

    ज़ुल्म करना है तो!

    नाले ‘बेख़ुद’ के क़यामत हैं तुझे याद रहे,ज़ुल्म करना है तो पत्थर का जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 21st Feb 2025

    राह नज़दीक की!

    दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम,राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 21st Feb 2025

    ये कमाँ क़ातिल की!

    मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की,तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 21st Feb 2025

    अभी घर पैदा कर!

    मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले,कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 21st Feb 2025

    रंज सहने को हमारा!

    शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं,रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 21st Feb 2025

    ख़ाक में पर पैदा कर!

    मिट के भी दूरी-ए-गुलशन नहीं भाती या रब,अपनी क़ुदरत से मिरी ख़ाक में पर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 21st Feb 2025

    पर आँखें नहीं भरीं!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी का यह गीत – कितनी बार तुम्हें देखापर आँखें नहीं भरीं। सीमित उर में चिर-असीमसौंदर्य समा न…

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