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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Feb 2025

    जहाँ से किनारा करो!

    काम आए न मुश्किल में कोई यहाँ मतलबी दोस्त हैं मतलबी यार हैं,इस जहाँ में नहीं कोई अहल-ए-वफ़ा ऐ ‘फ़ना’ इस जहाँ से किनारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी

  • 24th Feb 2025

    जिंदगी अपनी नहीं रही!

    आज मैं हिंदी नवगीत के श्रेष्ठ कवि तथा मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। बेचैन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                  लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर बेचैन जी का यह नवगीत –  दिवस खरीदे मजदूरी नेमजबूरी ने रातशाम हुई नीलाम…

  • 23rd Feb 2025

    जाम ले कर छलकता!

    ख़ूबसूरत घटाओं-भरी रात में लुत्फ़ उठाया करो ऐसी बरसात में, जाम ले कर छलकता हुआ हाथ में मय-कदे में भी इक शब गुज़ारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी Likes

  • 23rd Feb 2025

    मय-कदे का नज़ारा!

    फ़िक्र-ए-उक़्बा की मस्ती उतर जाएगी तौबा टूटी तो क़िस्मत सँवर जाएगी,तुम को दुनिया में जन्नत नज़र आएगी शैख़ जी मय-कदे का नज़ारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी

  • 23rd Feb 2025

    दिलबर इशारा करो!

    दिल तो क्या चीज़ है जान से जाएँगे मौत आने से पहले ही मर जाएँगे,ये अदा देखने वाले लुट जाएँगे यूँ न हँस हँस के दिलबर इशारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी

  • 23rd Feb 2025

    सदक़ा उतारा करो!

    ये तबस्सुम ये आरिज़ ये रौशन जबीं ये अदा ये निगाहें ये ज़ुल्फ़ें हसीं,आइने की नज़र लग न जाए कहीं जान-ए-जाँ अपना सदक़ा उतारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी

  • 23rd Feb 2025

    यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी!

    ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें कम से कम इतना कहना हमारा करो,चाँद शरमाएगा चाँदनी रात में यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी सँवारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी

  • 23rd Feb 2025

    ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी !

    ये दौर-ए-मोहब्बत भी अजब दौर है इस में,ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श

  • 23rd Feb 2025

    कलम का गीत!

    आज मैं हिंदी नवगीत विधा के अनूठे कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – क़लम में आग है तो ज़िन्दगी है ।क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है…

  • 22nd Feb 2025

    इक उम्र के यारों ने!

    अग़्यार का शिकवा नहीं इस अहद-ए-हवस में, इक उम्र के यारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श

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