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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Sep 2024

    हाथों में तिरे साग़र!

    भूला तो न होगा तुझे सुक़रात का अंजाम,हाथों में तिरे साग़र-ए-सम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Sep 2024

    मैं ने तो पुकारा है!

    मैं ने तो पुकारा है मोहब्बत के उफ़क़ से,रस्ते में तिरे संग-ए-हरम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Sep 2024

    उस दर पे तिरा सर!

    जिस दर से नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता,उस दर पे तिरा सर भी जो ख़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Sep 2024

    मुझे क़तरा भी मिला!

    हाँ ले ले क़सम गर मुझे क़तरा भी मिला हो,तू शाकी-ए-अर्बाब-ए-करम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Sep 2024

    अब तू भी सज़ावार!

    क्या मैं ने कहा था कि ज़माने से भला कर,अब तू भी सज़ावार-ए-सितम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Sep 2024

    ग़म है तो मुझे क्या!

    ऐ दोस्त! तिरी आँख जो नम है तो मुझे क्या,मैं ख़ूब हँसूँगा तुझे ग़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Sep 2024

    वरना,शि‍खर कौन सा है!

    आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय और श्रेष्ठ कवि रहे स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह गीत –…

  • 1st Sep 2024

    चुप-चाप अपनी आग!

    चुप-चाप अपनी आग में जलते रहो ‘फ़राज़’,दुनिया तो अर्ज़-ए-हाल से बे-आबरू करे| अहमद फ़राज़

  • 1st Sep 2024

    अब कोई हादसा ही!

    तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र,अब कोई हादसा ही तिरे रू-ब-रू करे| अहमद फ़राज़

  • 1st Sep 2024

    न कोई आरज़ू करे!

    अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए,ता-ज़िंदगी ये दिल न कोई आरज़ू करे| अहमद फ़राज़

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