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हाथों में तिरे साग़र!
भूला तो न होगा तुझे सुक़रात का अंजाम,हाथों में तिरे साग़र-ए-सम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मैं ने तो पुकारा है!
मैं ने तो पुकारा है मोहब्बत के उफ़क़ से,रस्ते में तिरे संग-ए-हरम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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उस दर पे तिरा सर!
जिस दर से नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता,उस दर पे तिरा सर भी जो ख़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मुझे क़तरा भी मिला!
हाँ ले ले क़सम गर मुझे क़तरा भी मिला हो,तू शाकी-ए-अर्बाब-ए-करम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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अब तू भी सज़ावार!
क्या मैं ने कहा था कि ज़माने से भला कर,अब तू भी सज़ावार-ए-सितम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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ग़म है तो मुझे क्या!
ऐ दोस्त! तिरी आँख जो नम है तो मुझे क्या,मैं ख़ूब हँसूँगा तुझे ग़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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वरना,शिखर कौन सा है!
आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय और श्रेष्ठ कवि रहे स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह गीत –…
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चुप-चाप अपनी आग!
चुप-चाप अपनी आग में जलते रहो ‘फ़राज़’,दुनिया तो अर्ज़-ए-हाल से बे-आबरू करे| अहमद फ़राज़
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अब कोई हादसा ही!
तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र,अब कोई हादसा ही तिरे रू-ब-रू करे| अहमद फ़राज़