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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Sep 2024

    मज़ा तो जब है कि!

    कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी ‘मुनीर’,मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2024

    कि मुझ को देख के!

    मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2024

    पलटना चाहें वहाँ से!

    न जा कि इस से परे दश्त-ए-मर्ग हो शायद,पलटना चाहें वहाँ से तो रास्ता ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2024

    ज़मीं के गिर्द भी पानी!

    ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी,ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2024

    दिखाई देता है जो!

    निगाह-ए-आईना मालूम अक्स ना-मालूम,दिखाई देता है जो असल में छुपा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 5th Sep 2024

    दीप थे अगणित !

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप छाप छोड़ने वाले कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अनेक आधुनिक कवियों को आगे बढ़ाने में अज्ञेय जी की महत्वपूर्ण भूमिका…

  • 4th Sep 2024

    कहीं हवा ही न हो!

    सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    दुनिया को कुछ तो!

    गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ऐ ‘मुनीर’,दुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    डरा देना चाहिए!

    इक तेज़ रअ’द* जैसी सदा हर मकान में,लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए| *बादलों की गरज मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    इक हश्र उस ज़मीं पे!

    मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर,इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

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