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मज़ा तो जब है कि!
कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी ‘मुनीर’,मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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कि मुझ को देख के!
मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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पलटना चाहें वहाँ से!
न जा कि इस से परे दश्त-ए-मर्ग हो शायद,पलटना चाहें वहाँ से तो रास्ता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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ज़मीं के गिर्द भी पानी!
ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी,ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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दिखाई देता है जो!
निगाह-ए-आईना मालूम अक्स ना-मालूम,दिखाई देता है जो असल में छुपा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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दीप थे अगणित !
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप छाप छोड़ने वाले कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अनेक आधुनिक कवियों को आगे बढ़ाने में अज्ञेय जी की महत्वपूर्ण भूमिका…
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कहीं हवा ही न हो!
सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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दुनिया को कुछ तो!
गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ऐ ‘मुनीर’,दुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी
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डरा देना चाहिए!
इक तेज़ रअ’द* जैसी सदा हर मकान में,लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए| *बादलों की गरज मुनीर नियाज़ी
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इक हश्र उस ज़मीं पे!
मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर,इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी