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सूनी साँझ!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – बहुत दिनों में आज…
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सच मुझे लिखना है!
ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत,सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूंगा| शहरयार
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सोचता रोज़ हूँ मैं!
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है,सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा| शहरयार
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तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा!
देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है,आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा| शहरयार
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दरवाज़ा खुला रक्खूँगा!
तेरे वा’दे को कभी झूट नहीं समझूँगा,आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा| शहरयार
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समय पर कविता- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…