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हक़ीक़तें हैं सलामत!
हक़ीक़तें हैं सलामत तो ख़्वाब बहुतेरे,मलाल क्यूँ हो कि कुछ ख़्वाब राएगाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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अरमाँ अभी कहाँ!
फ़क़ीर-ए-शहर के तन पर लिबास बाक़ी है,अमीर-ए-शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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बहुत घुटन है कोई!
बहुत घुटन है कोई सूरत-ए-बयाँ निकले,अगर सदा न उठे कम से कम फ़ुग़ाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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मन है!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हस्ताक्षर स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| माहेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – आज गीतगाने का मन हैअपने कोपाने का…
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हम सा कोई आवारा!
सहरा में बगूला भी है ‘मजरूह’ सबा भी,हम सा कोई आवारा-ए-आलम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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ऐ दोस्त कहीं ये भी!
अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल,ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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शबनम तो नहीं है!
चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर,सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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कुछ ज़ख़्म ही खाएँ!
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ,हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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सूरज से तिरा रंग!
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है,सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी