-
अंधेरा माँगने आया था!
अंधेरा माँगने आया था रौशनी की भीक,हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी
-
अगर न बात बढ़ाते
हमें तो उस लब-ए-नाज़ुक को देनी थी ज़हमत,अगर न बात बढ़ाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी
-
बग़ैर इश्क़ अँधेरे में!
बग़ैर इश्क़ अँधेरे में थी तिरी दुनिया,चराग़-ए-दिल न जलाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी
-
उन्हें ख़ुदा न बनाते!
हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते,उन्हें ख़ुदा न बनाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी
-
मोह की नदी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हस्ताक्षर श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – दोने में धरे किसी दीप की तरहवक़्त…
-
सितम के दौर में हम!
सितम के दौर में हम अहल-ए-दिल ही काम आए,ज़बाँ पे नाज़ था जिन को वो बे-ज़बाँ निकले| साहिर लुधियानवी
-
उधर भी ख़ाक उड़ी!
उधर भी ख़ाक उड़ी है इधर भी ख़ाक उड़ी,जहाँ जहाँ से बहारों के कारवाँ निकले| साहिर लुधियानवी