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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Sep 2024

    अंधेरा माँगने आया था!

    अंधेरा माँगने आया था रौशनी की भीक,हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी

  • 9th Sep 2024

    जो मयकदे में न जाते!

    ख़ता कोई नहीं पीछा किए हुए दुनिया, जो मय-कदे में न जाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी

  • 9th Sep 2024

    अगर न बात बढ़ाते

    हमें तो उस लब-ए-नाज़ुक को देनी थी ज़हमत,अगर न बात बढ़ाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी

  • 9th Sep 2024

    बग़ैर इश्क़ अँधेरे में!

    बग़ैर इश्क़ अँधेरे में थी तिरी दुनिया,चराग़-ए-दिल न जलाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी

  • 9th Sep 2024

    उन्हें ख़ुदा न बनाते!

    हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते,उन्हें ख़ुदा न बनाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी

  • 9th Sep 2024

    मोह की नदी!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हस्ताक्षर श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – दोने में धरे किसी दीप की तरहवक़्त…

  • 8th Sep 2024

    ज़मीं सख़्त है!

    ज़मीं सख़्त है आसमाँ दूर है,बसर हो सके तो बसर कीजिए| साहिर लुधियानवी

  • 8th Sep 2024

    मैं ज़िंदा हूँ ये!

    मैं ज़िंदा हूँ ये मुश्तहर कीजिए,मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए| साहिर लुधियानवी

  • 8th Sep 2024

    सितम के दौर में हम!

    सितम के दौर में हम अहल-ए-दिल ही काम आए,ज़बाँ पे नाज़ था जिन को वो बे-ज़बाँ निकले| साहिर लुधियानवी

  • 8th Sep 2024

    उधर भी ख़ाक उड़ी!

    उधर भी ख़ाक उड़ी है इधर भी ख़ाक उड़ी,जहाँ जहाँ से बहारों के कारवाँ निकले| साहिर लुधियानवी

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