आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हस्ताक्षर श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

दोने में धरे किसी दीप की तरह
वक़्त की नदी में हम
बह रहे उधर
शोख लहर हमको ले जा रही जिधर ।
ऊपर हैं तेज़ हवा के झोंके
बाती बुझ जाए कब, क्या पता
नीचे जल ही जल है, माटी का
यह तन गल जाए कब, क्या पता
डाली से टूट गिरे फूल की तरह
उम्र की नदी में हम
बह रहे उधर
शोख लहर हमको ले जा रही जिधर ।
कई-कई घाट बगल से गुज़रे
लेकिन पा सका कहीं ठौर नहीं
मन का सम्बंध किसी और जगह
लहरें ले जाती हैं और कहीं
बाढ़ में उजड़ गये मृणाल की तरह
मोह की नदी में हम
बह रहे उधर
शोख लहर हमको ले जा रही उधर ।
कितने अंतर्विरोध झेलकर
संधिपत्र लिखें नदी के कछार
कहाँ सँजोकर रक्खे त्तमस-द्वीप
पितरों के सूर्यमुखी संस्कार?
सम्भावित वृक्ष — शालबीज की तरह
रेत की नदी में हम
बह रहे उधर
शोख लहर हमको ले जा रही जिधर ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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