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याद हो कि न याद हो!
कहीं तुम को जाना हुआ अगर न गए बग़ैर ‘नज़ीर’ के,वो ज़माना अपने ‘नज़ीर’ का तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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हाथ में जो शराब ली!
कभी हाथ में जो शराब ली वहीं तुम ने छीन के फेंक दी,मुझे याद है मिरे पारसा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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हाथ में यही हाथ था!
मिरे शाने पर यही ज़ुल्फ़ थी जो है आज मुझ से खिंची खिंची,मिरे हाथ में यही हाथ था तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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चंद क़तरा-ए-अश्क!
तुम्हें चंद क़तरा-ए-अश्क भी किए पेश जिस के जवाब में,वो सलाम नीची निगाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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टूटे साज़ की वो सदा!
मिरी बेबसी ने ज़बान तक जिसे ला के तुम को रुला दिया,मिरे टूटे साज़ की वो सदा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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फिर भी उदास था!
मिरी बे-क़रारियाँ देख कर मुझे तुम ने दी थीं तसल्लियाँ,मिरा चेहरा फिर भी उदास था तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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मिरी हर नज़र थी इक
हुए मुझ से जिस घड़ी तुम जुदा तुम्हें याद हो कि न याद हो,मिरी हर नज़र थी इक इल्तिजा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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भिक्षा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात कवि स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नवीन जी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भी सक्रिय रहे थे| नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की यह कविता –…
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किसी को दोस्त बनाते!
किसी से बात जो की है तो वो ख़फ़ा हैं ‘नज़ीर’,किसी को दोस्त बनाते तो और क्या करते| नज़ीर बनारसी