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दीवाना-पन भी है!
अक़्ल-ए-मआश ओ हिकमत-ए-दुनिया के बावजूद,हम को अज़ीज़ इश्क़ का दीवाना-पन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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इस में कुछ करिश्मा!
माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है,पर इस में कुछ करिश्मा-ए-अक्स-ए-बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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गीतों का बादल!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के विख्यात गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – मैं गीत बरसाने वाला बादल हूँ ।प्यासे नयनों में हँसता काजल…
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साहू ने गिरवी रख ली!
तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी,साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की| गुलज़ार
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रेत कभी तन्हाई की!
आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं,क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की| गुलज़ार
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काल-कुएँ में गूँजती!
नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है,काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की| गुलज़ार