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इक तबस्सुम जो था!
वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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बच्चा निराले मेरे खेल!
रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल,मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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बन गई है मसअला!
मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए,बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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शहर है अंधा बहुत!
आँख होती तो नज़र आ जाते छाले पाँव के,सच को क्या देखेगा अपना शहर है अंधा बहुत| मंज़र भोपाली
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रो लिए तन्हा बहुत!
इस से पहले तो कभी एहसास होता ही न था,तुझ से मिल कर सोचते हैं रो लिए तन्हा बहुत| मंज़र भोपाली
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दोनों को तड़पाया!
वो थी आँगन में पड़ोसी के मैं घर की छत पे था,दूरियों ने आज भी दोनों को तड़पाया बहुत| मंज़र भोपाली
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इश्क़ वालों के लिए!
सोच लो पहले हमारे हाथ में फिर हाथ दो,इश्क़ वालों के लिए हैं आग के दरिया बहुत| मंज़र भोपाली
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तजरबा थोड़ा बहुत!
अब समझ लेते हैं मीठे लफ़्ज़ की कड़वाहटें,हो गया है ज़िंदगी का तजरबा थोड़ा बहुत| मंज़र भोपाली
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हम ने तो सोचा बहुत!
जान दे देंगे अगर दुनिया ने रोका रास्ता,और कोई हल न निकला हम ने तो सोचा बहुत| मंज़र भोपाली
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परियों के देश में!
आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत – परियों के देश में ना जाना युवराज तुमजाकर फिर लौट नही…