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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Apr 2025

    जन्नत पुकारती है!

    जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए, दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    एक नई शक्ल चाहिए!

    कुछ भी हो मुझ को एक नई शक्ल चाहिए,दीवार पर बिछाओ मुझे छत करो मुझे| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    पानी ने कब कहा था!

    मैं ने तो तुम से की ही नहीं कोई आरज़ू,पानी ने कब कहा था कि शर्बत करो मुझे| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    मिट्टी की सूरत करो!

    फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे,इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुख़्सत करो मुझे| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    सुनो हवाओ अगर मैं!

    बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    मुझे तू ढाल दे ऐसे!

    मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    अगर मैं छू लूँ !

    बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 8th Apr 2025

    अक्र चहार का मकबरा!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकार, कवि एवं संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी द्वारा एज़रा पाउंड की एक कविता का किया गया अनुवाद शेयर कर रहा हूँ। भारती की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी द्वारा किया गया एज़रा पाउंड की एक कविता का अनुवाद…

  • 7th Apr 2025

    मैं अपने झुण्ड से!

    मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा, मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 7th Apr 2025

    मैं चाहता हूँ कि!

    मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

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