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वतन की आबरू !
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं,वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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नए साल का गीत!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – अगर न दर्द मिटा मन से गत का, आगत का हर्ष…
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मैं राख होने लगा हूँ!
तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती,मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए| अज़हर इक़बाल
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तिरे बदन की शिकन!
है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन,मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए| अज़हर इक़बाल
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पाबंदियाँ निभाते हुए!
न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी,तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए| अज़हर इक़बाल