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दामन तर न कर दे!
सताया जिस को हमेशा तू ने सदा अकेला जो छुप के रोया,वो दिल-जला अपने आँसुओं से तुम्हारा दामन भी तर न कर दे| क़तील शिफ़ाई
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डर है नज़र तुम्हारी!
बड़े मज़े से मैं पी रहा हूँ मिरी तरफ़ तुम अभी न देखो,मुझे ये डर है नज़र तुम्हारी शराब को बे-असर न कर दे| क़तील शिफ़ाई
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कहीं वो दीवाना उम्र!
क़सम जिसे ज़ब्त-ए-ग़म की दे कर उठा दिया अपने दर से तू ने,कहीं वो दीवाना उम्र अपनी बग़ैर तेरे बसर न कर दे| क़तील शिफ़ाई
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पहले सहर न कर दे!
ये वस्ल की रात है ख़ुदारा नक़ाब चेहरे से मत हटाओ,तुम्हारे चेहरे का ये उजाला सहर से पहले सहर न कर दे| क़तील शिफ़ाई
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दर-ब-दर न कर दे!
बना हूँ मैं आज तेरा मेहमाँ कोई अदू को ख़बर न कर दे,उठा के वो तेरी अंजुमन से कहीं मुझे दर-ब-दर न कर दे| क़तील शिफ़ाई
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वह नदी में नहा रही है!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि कुमारेन्द्र पारस नाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कुमारेन्द्र पारस नाथ सिंह जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है कुमारेन्द्र पारस नाथ सिंह जी की यह कविता – वह नदी में नहा रही हैनदी धूप मेंऔर धूप उसके जवान…