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मिरी आँखों को आँसू!
मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी,मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है| जाँ निसार अख़्तर
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पिघलते आबशारों ने!
नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं,पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है| जाँ निसार अख़्तर
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किसी ने धूप बख़्शी है!
मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँही नहीं सँवरेकिसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है जाँ निसार अख़्तर
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शगुफ़्ता ताज़गी दी है!
बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है,चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है| जाँ निसार अख़्तर
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क्या वो दिन भी दिन हैं!
आज मैं प्रसिद्ध साहित्यकार और शायर स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। राही मासूम रज़ा साहब की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की यह ग़ज़ल – क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराएक्या वो…
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राह नज़दीक की!
दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम, राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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तीर बन जाए निशाना!
मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की,तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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अभी घर पैदा कर!
मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले,कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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दिन निकलने को है!
दिन निकलने को है राहत से गुज़र जाने दे,रूठ कर तू न क़यामत की सहर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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रंज सहने को हमारा!
शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं,रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी