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हम से पूछकर देखो!
ख़ल्वतों* के शैदाई ख़ल्वतों में खुलते हैं,हम से पूछ कर देखो राज़ पर्दा-दारों के|*एकांत साहिर लुधियानवी
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सुनो हवाओ अगर!
बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे तू ढाल दे ऐसे!
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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तर-ब-तर हो जाऊँ!
बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं अपने झुण्ड से!
मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा,मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं चाहता हूँ कि!
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर वो छोड़ दे!
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है,अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे सँभाल ले!
इससे पहले कि मैं बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना