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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Jun 2025

    अजनबी दयारों के!

    पहले हँस के मिलते हैं फिर नज़र चुराते हैं, आश्ना-सिफ़त हैं लोग अजनबी दयारों के| साहिर लुधियानवी

  • 14th Jun 2025

    गेसुओं की छाँव में!

    गेसुओं की छाँव में दिल-नवाज़ चेहरे हैं,या हसीं धुँदलकों में फूल हैं बहारों के| साहिर लुधियानवी

  • 14th Jun 2025

    हम से पूछकर देखो!

    ख़ल्वतों* के शैदाई ख़ल्वतों में खुलते हैं,हम से पूछ कर देखो राज़ पर्दा-दारों के|*एकांत साहिर लुधियानवी

  • 14th Jun 2025

    इस तरफ़ से गुज़रे!

    इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के,आज तक सुलगते हैं ज़ख़्म रहगुज़ारों के| साहिर लुधियानवी

  • 14th Jun 2025

    सुनो हवाओ अगर!

    बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 14th Jun 2025

    मुझे तू ढाल दे ऐसे!

    मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 14th Jun 2025

    तर-ब-तर हो जाऊँ!

    बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 14th Jun 2025

    वंसीवटों की डालियाँ!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री शिव ओम अंबर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| अंबर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शिव ओम अंबर जी की यह ग़ज़ल – दीमकों के नाम हैं वंसीवटों की डालियाँ,नागफनियों की क़नीजें हैं यहाँ शेफालियाँ। छोड़कर सर…

  • 13th Jun 2025

    मैं अपने झुण्ड से!

    मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा,मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

  • 13th Jun 2025

    मैं चाहता हूँ कि!

    मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना

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