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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Jun 2025

    जो दर खुला है!

    हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को,जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं देंगे| राहत इंदौरी

  • 11th Jun 2025

    हों लाख ज़ुल्म मगर!

    हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दु’आ नहीं देंगे,ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे| राहत इंदौरी

  • 11th Jun 2025

    जाने किस हाल में!

    आरज़ूओं के बहुत ख़्वाब तो देखो हो ‘वसीम’,जाने किस हाल में बे-दर्द ज़माना रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 11th Jun 2025

    आ ग़म-ए-दोस्त!

    आ ग़म-ए-दोस्त उसी मोड़ पे हो जाऊँ जुदा,जो मुझे मेरा ही रहने दे न तेरा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 11th Jun 2025

    ख़ुश्क मिट्टी ही ने!

    ख़ुश्क मिट्टी ही ने जब पाँव जमाने न दिए,बहते दरिया से फिर उम्मीद कोई क्या रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 11th Jun 2025

    अहसान तुम्हारा!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का एक अधूरा गीत  शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का यह गीत – इतनी बड़ी भीड़ में केवल, था मेरा ही कण्ठ अकेलातुमने स्वर दे…

  • 10th Jun 2025

    नक़्श अधूरा रक्खे!

    किन शिकस्तों के शब-ओ-रोज़ से गुज़रा होगा,वो मुसव्विर जो हर इक नक़्श अधूरा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 10th Jun 2025

    ज़िंदगी तुझ पे अब!

    ज़िंदगी तुझ पे अब इल्ज़ाम कोई क्या रक्खे,अपना एहसास ही ऐसा है जो तन्हा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 10th Jun 2025

    मैं उस मकान में !

    मैं उस मकान में रहता हूँ और ज़िंदा हूँ,‘वसीम’ जिस में हवा का गुज़र नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 10th Jun 2025

    किसी फ़क़ीर को !

    हमारी आँख के आँसू की अपनी दुनिया है,किसी फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

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