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तेरी शोख़ी-ए-हिना!
अभी और तेज़ कर ले सर-ए-ख़न्जर-ए-अदा को,मेरे ख़ूँ की है ज़रूरत तेरी शोख़ी-ए-हिना को। अली सरदार जाफ़री
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मियाँ ये क़र्ज़-दारी!
जहाँ तक हो सके ‘आलम किसी से क़र्ज़ मत लेना,मियाँ ये क़र्ज़-दारी ख़ैर-ओ-बरकत छीन लेती है| आलम निज़ामी
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जन्नत छीन लेती है!
अगर जन्नत की चाहत है तो ख़िदमत शर्त है माँ की,अगर माँ रूठ जाती है तो जन्नत छीन लेती है| आलम निज़ामी
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नज़ाकत छीन लेती है!
भरी हो जेब तो इंसाँ नशे में चूर रहता है,ज़रा सी तंग-दस्ती सब नज़ाकत छीन लेती है| आलम निज़ामी
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जहालत आदमी से!
ज़माने में ज़रूरी है बहुत ता’लीम का होना,जहालत आदमी से आदमियत छीन लेती है| आलम निज़ामी
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धूप!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री विनोद निगम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विनोद निगम जी का यह नवगीत – घाटियों में रितु सुखाने लगी हैमेघ धोए वस्त्र अनगिन रंग केआ गए दिन, धूप के सत्संग के पर्वतों…
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इबादत छीन लेती है|!
रिया-कारी* से बचिए ये बहुत ज़हरीली नागिन है,ये नागिन ज़िंदगी भर की ‘इबादत छीन लेती है| *Hypocaracy आलम निज़ामी