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फालतू चीज़!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री विष्णु नागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु नागर जी की यह कविता – घर में कोई चीज़फालतू नहीं थीटूटा कंघा लगता थाअमर हैभरोसा था अब खोएगा भी नहीं घड़ी बंद…
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कोई नग़्मा ही नहीं!
जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार,कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सिलासिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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बेगुनाह कौन है!
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद,बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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लेकिन इक शोख़ के!
हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को,लेकिन इक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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हमसफ़र कोई नहीं!
बाइस-ए-रश्क़ है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़,हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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रास्ते बन्द हैं सब!
काम अब कोई न आयेगा बस इक दिल के सिवा,रास्ते बन्द हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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मैं पुकारता रहा हूँ!
कोई बोलता नहीं है मैं पुकारता रहा हूँ,कभी बुतकदे में बुत को कभी काबे में ख़ुदा को। अली सरदार जाफ़री
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कहीं रह गई है शायद!
कहीं रह गई है शायद तेरे दिल की धड़कनों में,कभी सुन सके तो सुन ले मेरी ख़ूँशिदा नवा को। अली सरदार जाफ़री
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चश्म-ए-बेवफ़ा को!
तुझे किस नज़र से देखे ये निगाह-ए-दर्दआगीं,जो दुआयें दे रही है तेरी चश्म-ए-बेवफ़ा को। अली सरदार जाफ़री
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परस्पर!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विष्णु खरे जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विष्णु खरे जी की यह कविता – साथ का आख़िर यह भी कैसा मकामकि आलिंगन और चुम्बन तक से अटपटा लगने लगेऐसे और बाक़ी…