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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Jan 2025

    हम को औरों पे!

    अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं,हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2025

    जो हमें ख़्वाब दिखाना!

    कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें,जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2025

    एक छलावा!

    आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विजयदान देथा ‘बिज्जी’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विजयदान देथा ‘बिज्जी’ जी की यह कविता – ऊषे !मैं चिर मौन रहूँ भी तो क्योंकर ? जब बादल का श्याम हृदय…

  • 10th Jan 2025

    देर तक ख़ाक उड़ाना!

    सैर भी जिस्म के सहरा की ख़ुश आती है मगर,देर तक ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 10th Jan 2025

    जाना भी नहीं चाहता!

    जब से जाना है कि मैं जान समझता हूँ उसे,वो हिरन छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 10th Jan 2025

    उस को मंज़ूर नहीं है!

    उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी,और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 10th Jan 2025

    वो मगर ख़ुद को!

    शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है,वो मगर ख़ुद को जलाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 10th Jan 2025

    धूप का बिस्तर!

    हमें ख़बर न हुई और दिन भी डूब गया,चटख़ती धूप का बिस्तर बिछाए सोते रहे| शमीम हनफ़ी

  • 10th Jan 2025

    कश्तियाँ डुबोते रहे!

    ज़मीं की तरह समुंदर भी था सफ़र के लिए,मगर ये क्या कि यहाँ कश्तियाँ डुबोते रहे| शमीम हनफ़ी

  • 10th Jan 2025

    ख़ुद को खोते रहे!

    बस अपने-आप को पाने की जुस्तुजू थी कि हम,ख़राब होते रहे और ख़ुद को खोते रहे| शमीम हनफ़ी

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