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हम को औरों पे!
अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं,हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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जो हमें ख़्वाब दिखाना!
कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें,जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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एक छलावा!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विजयदान देथा ‘बिज्जी’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विजयदान देथा ‘बिज्जी’ जी की यह कविता – ऊषे !मैं चिर मौन रहूँ भी तो क्योंकर ? जब बादल का श्याम हृदय…
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देर तक ख़ाक उड़ाना!
सैर भी जिस्म के सहरा की ख़ुश आती है मगर,देर तक ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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जाना भी नहीं चाहता!
जब से जाना है कि मैं जान समझता हूँ उसे,वो हिरन छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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उस को मंज़ूर नहीं है!
उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी,और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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वो मगर ख़ुद को!
शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है,वो मगर ख़ुद को जलाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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कश्तियाँ डुबोते रहे!
ज़मीं की तरह समुंदर भी था सफ़र के लिए,मगर ये क्या कि यहाँ कश्तियाँ डुबोते रहे| शमीम हनफ़ी
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ख़ुद को खोते रहे!
बस अपने-आप को पाने की जुस्तुजू थी कि हम,ख़राब होते रहे और ख़ुद को खोते रहे| शमीम हनफ़ी