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बस धूप की तलवारें!
हर सिम्त मुक़ाबिल थीं बस धूप की तलवारें,पर आख़िरी क़तरे तक सहरा में लड़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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कमज़र्फ़ों के क़ब्ज़े में!
संसार में पानी से महरूम रहे प्यासे,कमज़र्फ़ों के क़ब्ज़े में हर युग में रहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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रे मन!
आज मैं हिंदी भाषा के वरिष्ठ राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। द्विवेदी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की यह कविता – प्रबल झंझावत में तूबन अचल हिमवान रे मन। हो बनी गम्भीर रजनी,सूझती…
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ऐ दश्ते-जुनूं तेरे!
ऐ दश्ते-जुनूं तेरे सूखे हुए काँटों पर,हमने तो लहू छिड़का, दुनिया ने कहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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तहज़ीब की आँखों से!
तहज़ीब की आँखों से दिन-रात लहू छलका,पत्थर की हवेली में यूँ लुटता रहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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दरिया से जुदा होकर!
दरिया से जुदा होकर बाज़ार में आ पहुँचा,बादल न जो बन पाया बोतल में बिका पानी। सूर्यभानु गुप्त
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पानी में बही बस्ती!
लोगों ने कभी ऐसा, देखा न सुना पानी,पानी में बही बस्ती, बस्ती में बहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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सागर से बग़ावत पर!
सागर से बग़ावत पर जब ज़िद पे अड़ा पानी,उस वक़्त सुनामी के पैकर में ढला पानी। सूर्यभानु गुप्त
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पानी पे चढ़ा पानी!
आकाश फटा ऐसा धरती ने भरा पानी,बरखा ने हदें तोड़ीं, पानी पे चढ़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त