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लगता है हर लिबास!
इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई,लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है| निदा फ़ाज़ली
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चर्ख़ा है जिस के पास !
माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही,चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है| निदा फ़ाज़ली
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वही बात ख़ास है!
मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो,क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है| निदा फ़ाज़ली
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दुख नदी-भर!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश निगम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। निगम जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरीश निगम जी का यह नवगीत – सुख अंजुरि-भरदुख नदी-भरजी रहेदिन-रात सीकर! ढही भीतीउड़ी छानीमेह सूखेआँख पानी फड़फड़ातेमोर-तीतर! हैं हवा केहोंठ दरकेफटे रिश्तेगाँव-घर…