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दिलबर इशारा करो!
दिल तो क्या चीज़ है जान से जाएँगे मौत आने से पहले ही मर जाएँगे,ये अदा देखने वाले लुट जाएँगे यूँ न हँस हँस के दिलबर इशारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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सदक़ा उतारा करो!
ये तबस्सुम ये आरिज़ ये रौशन जबीं ये अदा ये निगाहें ये ज़ुल्फ़ें हसीं,आइने की नज़र लग न जाए कहीं जान-ए-जाँ अपना सदक़ा उतारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी!
ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें कम से कम इतना कहना हमारा करो,चाँद शरमाएगा चाँदनी रात में यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी सँवारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी !
ये दौर-ए-मोहब्बत भी अजब दौर है इस में,ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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कलम का गीत!
आज मैं हिंदी नवगीत विधा के अनूठे कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – क़लम में आग है तो ज़िन्दगी है ।क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है…
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इक उम्र के यारों ने!
अग़्यार का शिकवा नहीं इस अहद-ए-हवस में, इक उम्र के यारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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चुप रह के बहारों ने!
माना कि थी ग़मगीन कली ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ से,चुप रह के बहारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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मदहोश इशारों ने भी!
किस तरह करें तुझ से गिला तेरे सितम का,मदहोश इशारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श