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संगतकार!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मंगलेश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की यह कविता – मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देतीवह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई…
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इन ख़ाली कमरों में!
मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा,इन ख़ाली कमरों में ‘नासिर’ अब शम्अ जलाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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जान-ए-ग़ज़ल ही!
अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं,ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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वो शहर में था तो!
वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था,अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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धूप उसी के साथ गई!
जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई,इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी