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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th May 2025

    जाती रुत का झोंका!

    आती रुत मुझे रोएगी,जाती रुत का झोंका हूँ| नासिर काज़मी

  • 4th May 2025

    संगतकार!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मंगलेश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की यह कविता – मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देतीवह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई…

  • 3rd May 2025

    मैं तिरा ख़ाली कमरा!

    मेरा दिया जलाए कौन,मैं तिरा ख़ाली कमरा हूँ| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    तेरी गली में सारा दिन!

    तेरी गली में सारा दिन,दुख के कंकर चुनता हूँ| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    अब के बरस मैं तन्हा!

    ओ पिछली रुत के साथी,अब के बरस मैं तन्हा हूँ| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    अपनी धुन में रहता हूँ,मैं भी तेरे जैसा हूँ| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    इन ख़ाली कमरों में!

    मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा,इन ख़ाली कमरों में ‘नासिर’ अब शम्अ जलाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    जान-ए-ग़ज़ल ही!

    अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं,ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    वो शहर में था तो!

    वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था,अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी

  • 3rd May 2025

    धूप उसी के साथ गई!

    जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई,इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी

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