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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Aug 2025

    सब हुनर सजाए थे!

    मैं ने अपने चेहरे पर सब हुनर सजाए थे,फ़ाश कर गया मुझ को सादा पैरहन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    सारा बाँकपन मेरा!

    उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा,उस की बंद मुट्ठी में सारा बाँकपन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    तेरा चेहरा नज़र आता!

    ये मोहब्बत की अलामत तो नहीं है कोई,तेरा चेहरा नज़र आता है जिधर जाते हैं| शकील जमाली

  • 2nd Aug 2025

    नदी कभी !

    आज फिर से एक गीत लिखने का प्रयास किया है, आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है- नदी कभी नाला बन जाती है,नाला कभी नदी बन जाता है। कुदरत के छल-बल पर निर्भर हैजीव-जंतुओं की हो क्या हालत, पौधा कभी पनपता बंजर मेंफसलें पाले से हो जाती मृत। अरमानों का अमर दीप भी तोबुझता हुआ दिया…

  • 1st Aug 2025

    ख़ामोश गुज़र जाते हैं!

    क्या जुनूँ-ख़ेज़ मसाफ़त थी तिरे कूचे की,और अब यूँ है कि ख़ामोश गुज़र जाते हैं| शकील जमाली

  • 1st Aug 2025

    पाँव में अब कोई!

    पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम,दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं| शकील जमाली

  • 1st Aug 2025

    लोग साँसों का कफ़न!

    ज़िंदगी ऐसे भी हालात बना देती है,लोग साँसों का कफ़न ओढ़ के मर जाते हैं| शकील जमाली

  • 1st Aug 2025

    अपने बच्चों की तरफ़!

    मौत को हम ने कभी कुछ नहीं समझा मगर आज,अपने बच्चों की तरफ़ देख के डर जाते हैं| शकील जमाली

  • 1st Aug 2025

    लोग कहते हैं कि !

    लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं,इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते हैं| शकील जमाली

  • 1st Aug 2025

    हज को जाना चाहता!

    हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने,सुना है हज को जाना चाहता है| शकील जमाली

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