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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th May 2025

    किस ने कहा कि टूट!

    किस ने कहा कि टूट गया ख़ंजर-ए-फ़रंग,सीने पे ज़ख़्म-ए-नौ भी है दाग़-ए-कुहन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2025

    नए पैरहन के साथ!

    दुश्मन की दोस्ती है अब अहल-ए-वतन के साथ,है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2025

    मेरी ग़ज़ल रही होगी!

    जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया,उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 7th May 2025

    मैं हूँ।  

    आज मैं हिंदी नवगीत के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।   लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत  – आसपासजंगली हवाएँ हैं,मैं हूँ । पोर-पोरजलती समिधाएँ हैंमैं हूँ । आड़े-तिरछेलगावबनते आते, स्वभावसिर धुनतीहोंठ की…

  • 6th May 2025

    बाजरे की फ़सल!

    तेरे गहनों सी खनखनाती थी,बाजरे की फ़सल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    एक शमअ-सी!

    सोचता हूँ कि बंद कमरे में,एक शमअ-सी जल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    कल का सपना!

    कल का सपना बहुत सुहाना था,ये उदासी न कल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    वो पिघल रही होगी!

    फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा,बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    चांदनी छत पे चल रही

    चांदनी छत पे चल रही होगी,अब अकेली टहल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    यहाँ टूटे हुए पर!

    किसी संवेदना के काम आएँगे,यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी। दुष्यंत कुमार

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