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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Aug 2025

    अपनी सूली अपने!

    क्यूँ शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ ‘क़तील‘, अपनी सूली अपने काँधे पर उठाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    ऐ मिरे यारो मिरे!

    देख लेना घर से निकलेगा न हम-साया कोई,ऐ मिरे यारो मिरे दर्द-आश्नाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    छट गए हालात के!

    छट गए हालात के बादल तो देखा जाएगा,वक़्त से पहले अँधेरे में न जाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    सोच की दीवार से!

    सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए,दिल में भी नग़्मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    कौन सा मौसम है ये!

    तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये,फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    घटाओ चुप रहो!

    बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं मोहतसिब,ऐ गरजती गूँजती काली घटाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    सुब्ह होने तक न!

    रात का पत्थर न पिघलेगा शुआ’ओं के बग़ैर,सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    सो रहे हैं दर्द !

    सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो,सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    और सिर्फ़ शाएर तू!

    ‘फ़राज़’ तू ने उसे मुश्किलों में डाल दिया,ज़माना साहब-ए-ज़र और सिर्फ़ शाएर तू| अहमद फ़राज़

  • 6th Aug 2025

    हो सके तो चला आ!

    फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ,जो हो सके तो चला आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़

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