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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Aug 2025

    मेरे किसी ख़याल की!

    शाम झुकी थी बहर पर पागल हो कर रंग से,या तस्वीर थी ख़्वाब में मेरे किसी ख़याल की| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Aug 2025

    रात बीते साल की!

    आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की,यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Aug 2025

    मौत से ठन गई!

    एक बार फिर से आज मैं, हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता – ठन गई!मौत से ठन गई! जूझने का…

  • 6th Aug 2025

    अपनी सूली अपने!

    क्यूँ शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ ‘क़तील‘, अपनी सूली अपने काँधे पर उठाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    ऐ मिरे यारो मिरे!

    देख लेना घर से निकलेगा न हम-साया कोई,ऐ मिरे यारो मिरे दर्द-आश्नाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    छट गए हालात के!

    छट गए हालात के बादल तो देखा जाएगा,वक़्त से पहले अँधेरे में न जाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    सोच की दीवार से!

    सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए,दिल में भी नग़्मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    कौन सा मौसम है ये!

    तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये,फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    घटाओ चुप रहो!

    बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं मोहतसिब,ऐ गरजती गूँजती काली घटाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Aug 2025

    सुब्ह होने तक न!

    रात का पत्थर न पिघलेगा शुआ’ओं के बग़ैर,सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई

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