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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th May 2025

    अपने निशाने के लिए!

    ऐसी दफ़अ’ न लगा जिस में ज़मानत मिल जाए,मेरे किरदार को चुन अपने निशाने के लिए| शकील जमाली

  • 9th May 2025

    अश्क पीने के लिए!

    अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए,अब मिरे पास ख़ज़ाना है लुटाने के लिए| शकील जमाली

  • 9th May 2025

    सूनापन चहका-चहका!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री यश मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। यश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की है। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री यश मालवीय जी का यह गीत – अभिवादन बादल-बादलख़बर लिये वन-उपवन कीकितने आशीर्वाद लियेपहली बरखा सावन की बरस-बरस हैं घन बरसेअब की…

  • 8th May 2025

    फिर अपने साथ उसे!

    फिर उठ के गर्म करें कारोबार-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुनूँ, फिर अपने साथ उसे भी असीर-ए-दाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 8th May 2025

    ग़ुलाम रह चुके!

    ग़ुलाम रह चुके तोड़ें ये बंद-ए-रुस्वाई,कुछ अपने बाज़ू-ए-मेहनत का एहतिराम करें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 8th May 2025

    सखि, वे मुझसे कहकर जाते!

    आज मैं हिंदी साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय मैथिली शरण गुप्त जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ। यह कविता लक्ष्मण जी की पत्नी सुमित्रा से संबंधित है, जिनको वे बिना सूचित किए वन में चले गए थे। गुप्त जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत…

  • 7th May 2025

    न माँगूँ बादा-ए-गुल!

    न माँगूँ बादा-ए-गुल-गूँ से भीक मस्ती की,अगर तिरे लब-ए-लालीं मिरा ये काम करें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2025

    थी आरज़ू कि तिरे!

    ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना,थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2025

    ये जीने का एहतिमाम!

    अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें,उसे भुला के ग़म-ए-ज़िंदगी का नाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2025

    क़ाफ़िले की मिरे!

    ‘मजरूह’ क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है,रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी

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