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आँख भी पुर-नम नहीं!
अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं,अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है| असरार-उल-हक़ मजाज़
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मुझे भी ग़म नहीं है!
मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो,तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है| असरार-उल-हक़ मजाज़
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जेब
आज मैं हिंदी के विख्यात कवि श्री प्रयाग शुक्ल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता– मेरी भी एक जेब है ।पत्नी कहती हैरहती है खाली ।खाली जेब हर सुबह मिलती है खाली ।कोट…
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ग़म ही ग़म नहीं है!
बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में, ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है| असरार-उल-हक़ मजाज़
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तिरी ज़ुल्फ़ों का!
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना,तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है| असरार-उल-हक़ मजाज़