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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Sep 2025

    चलते-चलते!

    #ChalteChalte

  • 28th Sep 2025

    जब तक है दिलों में !

    जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं,जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

  • 28th Sep 2025

    पैमान-ए-वफ़ा भी !

    जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए,पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

  • 28th Sep 2025

    हँसने में जो आँसू !

    हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं,हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

  • 28th Sep 2025

    मेरा एक और गीत- मौसम का वायलिन

    आज मैं अपना एक और नवगीत, शेयर कर रहा हूँ- हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है। मुझे आपकी सम्मति की प्रतीक्षा रहेगी- आप मेरे यू ट्यूब चैनल को भी सब्स्क्राइब करेंगे तो अच्छा लगेगा, लिंक यहाँ दिया गया है- https://www.youtube.com/@kris230450 आज के लिए इतना ही नमस्कार

  • 28th Sep 2025

    पहरों बातें होती हैं!

    जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के,अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

  • 28th Sep 2025

    क़िस्मत जागे तो हम!

    क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें,दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

  • 28th Sep 2025

    इस बदली हुई रुत में !

    आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है,इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

  • 28th Sep 2025

    हम मन की डोरी खोलेंगे!

    आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- हम मन की डोरी खोलेंगे। गांठ बहुत मन की डोरी मेंफिर भी यह सुलझी दिखती हैबनी तरल जैसे जल धारासंवेदन आखर लिखती है, इसकी भाषा, अपनी भाषा, इसकी बानी हम बोलेंगे। यह भावों के नीर नहाई सभी तीर्थ यूं ही कर आई, कभी…

  • 27th Sep 2025

    गूँगों से भी बातें!

    तय करना हैं झगड़े जीने के जिस तरह बने कहते सुनते,बहरों से भी पाला पड़ता है गूँगों से भी बातें होती हैं| आरज़ू लखनवी

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