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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Jul 2025

    मेहरबानी है!

    बे-नियामेहरबानी हैज़ाना सुन लिया ग़म-ए-दिल,मेहरबानी है,मेहरबानी है | फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 1st Jul 2025

    ज़िंदगी दर्द की कहानी

    ज़िंदगी दर्द की कहानी है,चश्म-ए-अंजुम में भी तो पानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 1st Jul 2025

    मुझ पे चलता नहीं है!

    मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ,मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    मैं तो रहता हूँ!

    मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़,क़ैस करता है काम-काज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    हाल अच्छा नहीं है!

    चारा-गर की नज़र बताती है,हाल अच्छा नहीं है आज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    पूछ लेते वो बस!

    पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा,कितना आसान था इलाज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    याद है जो उसी को!

    याद है जो उसी को याद करो, हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    मैं बोलता ही नहीं!

    यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा,जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    हमने ही सदारत की!

    रात भी हम ने ही सदारत की,बज़्म में और कोई था ही नहीं| फ़हमी बदायूनी

  • 1st Jul 2025

    यह दिया बुझे नहीं!

    एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नेपाली जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का यह गीत– घोर अंधकार हो,चल रही बयार हो,आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे…

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