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अहल-ए-तूफ़ाँ आओ!
अहल-ए-तूफ़ाँ आओ दिल-वालों का अफ़्साना कहें,मौज को गेसू भँवर को चश्म-ए-जानाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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है भला सा नाम!
है भला सा नाम उस का मैं अभी से क्या बताऊँ,किया बे-क़रार हँस कर मुझे एक आदमी ने| मजरूह सुल्तानपुरी
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कभी इस परी का!
कभी इस परी का कूचा कभी उस हसीं की महफ़िल,मुझे दर-ब-दर फिराया मिरे दिल की सादगी ने| मजरूह सुल्तानपुरी
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मिरे दिल मैं कौन है तू!
मिरे दिल मैं कौन है तू कि हुआ जहाँ अँधेरा,वहीं सौ दिये जलाए तिरे रुख़ की चाँदनी ने| मजरूह सुल्तानपुरी
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कई ख़्वाब देख डाले!
कहीं बे-ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने,कई ख़्वाब देख डाले यहाँ मेरी बे-ख़ुदी ने| मजरूह सुल्तानपुरी
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ये जो पेड़ है ये!
उसे अपने होंटों का लम्स दो कि ये साँस ले,ये जो पेड़ है ये हरा-भरा नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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लो दिन बीता, लो रात गई!
एक बार फिर से आज मैं हिंदी गीत के शिखर व्यक्तित्व स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।बच्चन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत– सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,डूबा, संध्या आई, छाई,सौ संध्या सी वह संध्या थी,क्यों उठते-उठते…
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तेरी बंदगी से मिरा!
तू ख़ुदा-ए-हुस्न-ओ-जमाल है तो हुआ करे, तेरी बंदगी से मिरा भला नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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कोई आइना हो जो!
कोई आइना हो जो ख़ुद से मुझ को मिला सके,मिरा अपने-आप से सामना नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल