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आरज़ू ही रह गई!
आरज़ू ही रह गई ‘मजरूह’ कहते हम कभी,इक ग़ज़ल ऐसी जिसे तस्वीर-ए-जानाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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शहर को वीरान या!
पारा-ए-दिल है वतन की सरज़मीं मुश्किल ये है,शहर को वीरान या इस दिल को वीराना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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तिश्नगी ही तिश्नगी है!
तिश्नगी ही तिश्नगी है किस को कहिए मय-कदा,लब ही लब हम ने तो देखे किस को पैमाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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उस बुत की कलाई!
थामें उस बुत की कलाई और कहें इस को जुनूँ,चूम लें मुँह और इसे अंदाज़-ए-रिंदाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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चाहे दीवाना कहें!
दार पर चढ़ कर लगाएँ नारा-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम,सब हमें बाहोश समझें चाहे दीवाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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दीप और मनुष्य!
एक बार फिर से आज मैं हिंदी गीतों के राजकुंवर कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नीरज जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपालदास नीरज जी का यह गीत– एक दिन मैंने कहा यूँ दीप से‘‘तू धरा पर…