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सोचने समझने में !
ज़लज़ले की सूरत में इश्क़ वार करता है,सोचने समझने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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तितलियाँ पकड़ने में!
उन की और फूलों की एक सी रिदाएँ हैं,तितलियाँ पकड़ने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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रंग यूँ तो होते हैं!
रंग यूँ तो होते हैं बादलों के अंदर ही,पर धनक के बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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ज़िंदगी समझने में!
उम्र-भर की मोहलत तो वक़्त है तआ’रुफ़ का,ज़िंदगी समझने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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ख़्वाहिशें परिंदों से!
ख़्वाहिशें परिंदों से लाख मिलती-जुलती हों,दोस्त पर निकलने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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सुधि!
एक बार फिर से आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। महादेवी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का यह गीत– किस सुधिवसन्त का सुमनतीर,कर गया मुग्ध मानस अधीर? वेदना गगन…
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सीढ़ियाँ उतरने में!
दस्तकें भी देने पर दर अगर न खुलता हो, सीढ़ियाँ उतरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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दास्तान बनने में!
दर्द की कहानी को इश्क़ के फ़साने को,दास्तान बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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बात है क़बीले की!
फ़र्द*की नहीं है ये बात है क़बीले की,गिर के फिर सँभलने में देर कुछ तो लगती है|*Person अमजद इस्लाम अमजद
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ख़ुश्क भी न हो पाई!
ख़ुश्क भी न हो पाई रौशनाई हर्फ़ों की,जान-ए-मन मुकरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद