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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Oct 2025

    दुनिया की तमन्ना थी!

    दुनिया की तमन्ना थी कभी हम को भी ‘फ़ाकिर’,अब ज़ख़्म-ए-तमन्ना की दवा ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर

  • 4th Oct 2025

    ये भी तो सज़ा है!

    ये भी तो सज़ा है कि गिरफ़्तार-ए-वफ़ा हूँक्यूँ लोग मोहब्बत की सज़ा ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर

  • 4th Oct 2025

    हम अपने गुनाहों में!

    कुछ देर ठहर जाइये बंदा-ए-इन्साफ़,हम अपने गुनाहों में ख़ता ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर

  • 4th Oct 2025

    बुढ़िया!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – बुढ़िया की झोली मेंकुछ फल थे सूखे हुए,कुछ दबी हुई आकांक्षाएँ,कुछ अनकहे रह…

  • 3rd Oct 2025

    हम लोग भी नादाँ हैं!

    दुनिया से वफ़ा करके सिला ढूँढ रहे हैं,हम लोग भी नादाँ हैं ये क्या ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर

  • 3rd Oct 2025

    तुम ने कह दी है!

    लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की,तुम ने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    कैसे आकाश में!

    कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीअ‘त से उछालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    आज संदूक़ से वो !

    आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    इस बहकती हुई!

    रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो| दुष्यंत कुमार

  • 3rd Oct 2025

    आज सय्याद को!

    लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो| दुष्यंत कुमार

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