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दोस्तों की दाद तो!
दोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदाआज दुश्मन ने कहा–शाबाश तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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चाँदनी का हास!
आ गया हूँ बाद मुद्दत के शहर से गाँव में,आज देखा चाँदनी का हास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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सुबह आयेगी ज़रूर!
रात कितनी भी घनी हो सुबह आयेगी ज़रूर,लौट आया आपका विश्वास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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इंसान तो इंसान है!
है नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान है,है जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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आँसुओं से नम मिली!
ख़ून से लथपथ हवाएँ ख़ौफ-सी उड़ती रहीं,आँसुओं से नम मिली वातास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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क़त्ल, चोरी, रहज़नी!
क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर,चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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लोग यों तो रोज़ ही!
लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे,आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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बौने बड़े दिखने लगे हैं!
एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत– नज़रिए हो गये छोटे हमारेमगर बौने बड़े दिखने लगे हैचले इंसानियत की राह…