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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Jul 2025

    तरसते अब हैं पानी!

    जिन्हें सींचा था ख़ून-ए-दिल से अगले बाग़बानों ने,तरसते अब हैं पानी को वो पौदे मेरे गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    असीरी लाज़मी है!

    यहाँ तस्बीह का हल्क़ा वहाँ ज़ुन्नार का फंदा,असीरी लाज़मी है मज़हब-ए-शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    सैकड़ों मोती हैं!

    ज़माने में नहीं अहल-ए-हुनर का क़द्र-दाँ बाक़ी,नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    बहार आई है!

    हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है,क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    तिरी क़ुदरत से वो!

    गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में,तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    शजर सकते में हैं!

    शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में,सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    सिलसिला हवस का!

    इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी,इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    गुल हैं मगर !

    अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं| *कटी हुई शाखा चकबस्त बृज नारायण

  • 12th Jul 2025

    मत कर यों बदनाम!

    एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– मत कर यों बदनाम मुझे तू व्यर्थ सहेली बावरी,देखी तक भी नहीं आज…

  • 11th Jul 2025

    जो दाग़ आसमाँ के हैं!

    हम सोचते हैं रात में तारों को देख करशमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं चकबस्त बृज नारायण

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