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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Oct 2025

    कविता से बाहर!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और मेरे अग्रज कुबेर दत्त जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। कुबेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है कुबेर दत्त जी की यह कविता – कभी-कभी सोचता हूँबहुत हो गईबहुत हो गई कविताई । जीवन के नाम पर शेषचेक एक…

  • 17th Oct 2025

    काँटों में रख के फूल!

    काँटों में रख के फूल हवा में उड़ा के ख़ाक, करता है सौ तरह से इशारे मुझे कोई| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 17th Oct 2025

    पागल हूँ चाहता हूँ!

    गो जानता हूँ सब ही निशाने पे हैं यहाँ,पागल हूँ चाहता हूँ न मारे मुझे कोई| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 17th Oct 2025

    देखती ही रहो आज दर्पण न तुम!

    आज मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से नीरज जी का लिखा और मुकेश जी का गाया यह बेहद खूबसूरत गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- देखती ही रहो आज दर्पण न तुम!https://youtu.be/aB3QOQ7_2m4 आशा है आपको पसंद आएगा,धन्यवाद

  • 17th Oct 2025

    तन्हाई डस रही है!

    दरिया-ए-शब के पार उतारे मुझे कोई,तन्हाई डस रही है पुकारे मुझे कोई| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 17th Oct 2025

    काँटे बोने वाले!

    काँटे बोने वाले सच-मुच तू भी कितना भोला है,जैसे राही रुक जाएँगे तेरे काँटे बोने से| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 17th Oct 2025

    मिट सकते हैं धोने से|!

    बाद-अज़-वक़्त पशीमाँ हो कर ज़ख़्म नहीं भर सकते तुम,दामन के धब्बे अलबत्ता मिट सकते हैं धोने से| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 17th Oct 2025

    कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी!

    आज मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से स्वर्गीय अल्हड बीकानेरी जी द्वारा लिखी गई एक ब्रजभाषा के लोकगीत की पैरोडी अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी!https://youtu.be/AGKF3YfTEz4 आशा है आपको पसंद आएगी।धन्यवाद

  • 17th Oct 2025

    घर के कोने कोने से!

    फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से,वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 17th Oct 2025

    पागल हवाएं थीं!

    आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- साथ में अपने महज़ पागल हवाएं थींदूर आंखें मिचमिचाती सी दिशाएं थीं। दिग्विजय का स्वप्न भी हमने नहीं पालायात्रा को बस हमारा स्वत्व दे डालारहे चलते मान यह कर्तव्य है अपनाहै कहीं मंज़िल, वहम भी यह नहीं पाला, साथ में कुछ धारणाएं, कुछ दुआएं थीं।…

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