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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Jul 2025

    न रंगीनियों में!

    न रंगीनियों में न रानाइयों में,नज़र घिर गई अपनी परछाइयों में| कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    चंद अंगड़ाइयों में!

    न आया मज़ा शब की तन्हाइयों में,सहर हो गई चंद अंगड़ाइयों में| कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    मोहब्बत से तुम्हें!

    मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम,निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए| कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    मोहब्बत ज़हर है!

    वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ,मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार* हो जाए| *Addiction कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    मिरा दीदार हो जाए!

    ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की,मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए| कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    ज़माने से कहो कुछ!

    ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए,हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए| कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    सलाम उस पर!

    सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए,सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए| कैफ़ भोपाली

  • 17th Jul 2025

    टूटा बाजूबन्द!

    एक बार फिर से आज मैं, हिंदी नवगीत के अद्वितीय हस्ताक्षर स्वर्गीय  रमेश रंजक जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत– मौसमी प्यास चौगुनी हुईदेख दुविधा का चाँद अमन्दफ़सल के कटे खेत…

  • 16th Jul 2025

    तारों के ख़ज़ाने ढूँढे है!

    क्या बात है तेरी बातों की लहजा है कि है जादू कोई, हर आन फ़ज़ा में दिल उड़ कर तारों के ख़ज़ाने ढूँढे है| ताज भोपाली

  • 16th Jul 2025

    आँखों में लिए शबनम

    आँखों में लिए शबनम की चमक सीने में लिए दूरी की कसक,वो आज हमारे पास आ कर कुछ ज़ख़्म पुराने ढूँढे है| ताज भोपाली

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