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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Oct 2025

    न बतलाई किसी ने!

    न बतलाई किसी ने भी हक़ीक़त राज़-ए-हस्ती की,बुतों से जा के सर फोड़ा बहुत दैर-ए-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 21st Oct 2025

    अँधेरी रात में मोती!

    नहीं होता है मुहताज-ए-नुमाइश फ़ैज़ शबनम का,अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 21st Oct 2025

    सहर होती गुलशन में!

    शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से,फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 21st Oct 2025

    मेरा यूट्यूब चैनल

    मैं अपने सभी साथियों को बताना चाहूंगा कि मैं अपने यूट्यूब चैनल में अपने स्वर में अपनी तथा अनेक श्रेष्ठ कवियों की रचनाएं शेयर करता रहता हूँ।यूट्यूब की अपनी पोस्ट मैं यहाँ भी शेयर करता हूँ लेकिन बेहतर होगा यदि कविता और पुराने फिल्मी गीतों में रुचि रखने वाले साथी मेरे यूट्यूब चैनल को भी…

  • 21st Oct 2025

    सही गलत रिश्तों में बंधे हुए हम!

    आज फिर से मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ जो मेरे अग्रज श्री कुबेर दत्त जी ने लिखा था। कुबेर जी ने बाद में बाद में दूरदर्शन के लिए प्रोड्यूस किए गए अपने कार्यक्रमों के माध्यम से भी बहुत नाम कमाया था। कुबेर दत्त जी द्वारा लिखे…

  • 21st Oct 2025

    शराब-ए-हुस्न को!

    शराब-ए-हुस्न को कुछ और ही तासीर देता है,जवानी के नुमू से बे-ख़बर होना लड़कपन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 21st Oct 2025

    सैकड़ों मोती हैं!

    ज़माना में नहीं अहल-ए-हुनर का क़द्र-दाँ बाक़ी,नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 21st Oct 2025

    दीपावली की रात!

    प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- रोशनी से धुल गई सारी सियाहीअमावस की इस अंधेरी रात की। चांद बेशक है नहीं, पर छा रहाउल्लसित पावन उजाला, हर तरफहै हमारी आस्था का प्रतिफलन चांदनी का सिलसिला चारों तरफ अमर स्मृतियां हैं हमारे साथ मेंसत्य की जय की, असत की मात की। रात…

  • 20th Oct 2025

    क़फ़स में कह गया!

    हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है, क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण

  • 20th Oct 2025

    धूप और शबनम!

    गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में,तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में| चकबस्त बृज नारायण

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