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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Oct 2025

    आइना-दर-आइना!

    हुस्न-ओ-उलफ़त दोनों हैं अब एक सत्ह पर मगर,आइना-दर-आइना बस आइना-दर-आइना| कृष्ण बिहारी नूर

  • 22nd Oct 2025

    उजाले की कोई दीवार

    जैसे अन-देखे उजाले की कोई दीवार हो,बंद हो जाता है कुछ दूरी पे हर इक रास्ता| कृष्ण बिहारी नूर

  • 22nd Oct 2025

    फूल में रंगत भी थी!

    फूल में रंगत भी थी ख़ुशबू भी थी और हुस्न भी,उस ने आवाज़ें तो दीं लेकिन कहाँ मैं सुन सका| कृष्ण बिहारी नूर

  • 22nd Oct 2025

    है किताब-ए-ज़िंदगी!

    अव्वल-ओ-आख़िर के कुछ औराक़ मिलते ही नहीं,है किताब-ए-ज़िंदगी बे-इब्तिदा बे-इंतिहा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 22nd Oct 2025

    इक तरफ़ क़ानून है!

    इक तरफ़ क़ानून है और इक तरफ़ इंसान है,ख़त्म होता ही नहीं जुर्म-ओ-सज़ा का सिलसिला| कृष्ण बिहारी नूर

  • 22nd Oct 2025

    मैं समुंदर पी गया!

    उस की धुन में हर तरफ़ भागा किया दौड़ा किया, एक बूँद अमृत की ख़ातिर मैं समुंदर पी गया| कृष्ण बिहारी नूर

  • 22nd Oct 2025

    तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी!

    आज मैं अपने यूट्यूब चैनल से मुकेश जी का गाया हुआ अत्यंत सुंदर भजन अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी,दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरीhttps://youtu.be/x4sibD2afpU आशा है आपको पसंद आएगा।धन्यवाद

  • 22nd Oct 2025

    भर दिया जाम!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – भर दिया जाम जब तुमने अपने हाथों सेप्रिय! बोलो, मैं इंकार करूँ भी तो कैसे…

  • 21st Oct 2025

    उड़ा कर ले गई!

    उड़ा कर ले गई बाद-ए-ख़िज़ाँ* इस साल उस को भी,रहा था एक बर्ग-ए-ज़र्द बाक़ी मेरे गुलशन में|*पतझड की हवा चकबस्त बृज नारायण

  • 21st Oct 2025

    नई तहज़ीब के झगड़े!

    पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है,नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण

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