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आइना-दर-आइना!
हुस्न-ओ-उलफ़त दोनों हैं अब एक सत्ह पर मगर,आइना-दर-आइना बस आइना-दर-आइना| कृष्ण बिहारी नूर
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उजाले की कोई दीवार
जैसे अन-देखे उजाले की कोई दीवार हो,बंद हो जाता है कुछ दूरी पे हर इक रास्ता| कृष्ण बिहारी नूर
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फूल में रंगत भी थी!
फूल में रंगत भी थी ख़ुशबू भी थी और हुस्न भी,उस ने आवाज़ें तो दीं लेकिन कहाँ मैं सुन सका| कृष्ण बिहारी नूर
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है किताब-ए-ज़िंदगी!
अव्वल-ओ-आख़िर के कुछ औराक़ मिलते ही नहीं,है किताब-ए-ज़िंदगी बे-इब्तिदा बे-इंतिहा| कृष्ण बिहारी नूर
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इक तरफ़ क़ानून है!
इक तरफ़ क़ानून है और इक तरफ़ इंसान है,ख़त्म होता ही नहीं जुर्म-ओ-सज़ा का सिलसिला| कृष्ण बिहारी नूर
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मैं समुंदर पी गया!
उस की धुन में हर तरफ़ भागा किया दौड़ा किया, एक बूँद अमृत की ख़ातिर मैं समुंदर पी गया| कृष्ण बिहारी नूर
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तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी!
आज मैं अपने यूट्यूब चैनल से मुकेश जी का गाया हुआ अत्यंत सुंदर भजन अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी,दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरीhttps://youtu.be/x4sibD2afpU आशा है आपको पसंद आएगा।धन्यवाद
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भर दिया जाम!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – भर दिया जाम जब तुमने अपने हाथों सेप्रिय! बोलो, मैं इंकार करूँ भी तो कैसे…
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उड़ा कर ले गई!
उड़ा कर ले गई बाद-ए-ख़िज़ाँ* इस साल उस को भी,रहा था एक बर्ग-ए-ज़र्द बाक़ी मेरे गुलशन में|*पतझड की हवा चकबस्त बृज नारायण
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नई तहज़ीब के झगड़े!
पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है,नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण